गणित का इतिहास हिंदी में:-

भूमिका:-

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गणित एक कठिन विषय है।जिसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं है।आयिए आज हम गणित के इतिहास की स्टोरी समझ ते है।

जितना पुराना मानव समाज है , उतनी ही पुरानी है,गणित लेकिन जैसे ही हम मानव समाज को जानने की ओर बढते है,वैसे ही गणित की कहानी पीछे छूट जाती है।जबकि दुनिया का सारा विज्ञान इसी गणित पर टीका है।
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विज्ञान ही नहीं कला के कई क्षेत्र जैसे संगीत हो या चित्रकला आदि की बारीकियां भी गणितीय विश्लेषण के बिना संभव नहीं है।
महान गणितज्ञ payithagoras ने ईसा से कई वर्ष पूर्व ही गणित व चित्रकला के आपसी रिश्ते को सुलझा लिया था।

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गणित का इतिहास:-

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वैज्ञानिकों का मानना है कि अधिकतर जीव जंतु सात तक गीन सकते है।लेकिन इंसान ने कब सीखा इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।
गणित के अंकों को अंकित करने का प्रारंभिक काम Babylon ki सभ्यता में मिलते है।यहां अंकों को मिट्टी की पट्टी या भोज पत्रो पर लिखते थे।

*धरती पर इंसानों द्वारा बनाई गई 5000 साल पुरानी कृतियों में मिश्र के पिरामिड प्रमुख है, जो इस बात का प्रमाण है कि गणितीय ज्यामिति का विकास मानव सभ्यता में बहुत पहले हो चुका था।क्योंकि बिना के ज्ञान के पिरामिड जैसे स्ट्रक्चर को तैयार करना आसान नहीं था।ये स्ट्रक्चर यूनानी गणितीय payithagoras के परिमेय का व्यावहारिक प्रयोग ही तो है।
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*गणित का अगला पड़ाव चीन में है।चीन की बात हो ओर Great wall of China " का जिक्र ना हो  एसा तो हो नहीं सकता। ऊंची - नीची,गहरी खाइयों से होते हुए एईएसी दीवार को बनाना आज के इंजीनियर्स के लिए भी एक चुनौती पूर्ण काम है।हजारों किलोमीटर लंबी दीवार जो सदियों तक बनती रही।चीन की दीवार के बनने के पीछे मानवीय श्र म के साथ साथ गणित का बड़ा योगदान रहा है। कयोकी दीवार बनाने के लिए उतार चड़ाव का angel, दूरी व इसमें लगाए जाने वाले समान की जानकारी बिना गणित के संभव नहीं है।

इंसान के जीवन में गणित की गणना बचपन में उंगलियों से शुरु  होती है ।लेकिन Babylon , मिश्र व अन्य सभ्यताओं की तुलना में एक होशियारी कि वो थी कॉलम बनाना ।जैसे कि ones,tens, hundreds , thousands,lacs जैसी बड़ी गणनाएं जोड़ी व घटाई जाने लगी। इसे dicimal place value system कहते है।आज भी मैथ्स में हम इसका इसतेमाल करते है।

भारत का गणित में योगदान:-

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 1 से 9 तक की सख्यायो का योगदान तो चीनी भी करते थे परन्तु भारत ने इन नंबर्स को लिखना आसान बना दिया।लेकिन कहानी का असली ट्विस्ट या था कि इंसान m हाथ में दस उंगलियां थी और वो दस,दहाई,सेंकड़ों आदि को समझता था लेकिन लिख नहीं सकता था। इसे पहली बार लिखा भारत ने उसे अंक के तौर पर देखा वो था  भारत ।भारत ने ज़ीरो को पूरा नया रूप से दिया । उससे पहले ये मात्र एक place holder" के रूप में था। मिश्र व बेबीलोन वाले ज़ीरो की जगह खाली छोड़ देते थे।लेकिन भारत ने उसे दसवें अंक का दर्जा दिया।

इससे बाद तो मानो गणित व विज्ञान की दुनिया ही बदल गई ।क्युकी बड़ी से बड़ी गणनाएं उनको जोड़ना, घटाना व अन्य गणितीय आंकलन बहुत आसान हो गए।अब तो मानो गणित की गाड़ी को एक पहिया मिल गया था।

जब ज़ीरो अंक के रूप में स्वीकारता मिली तो इसका नाम पहले से ही तैयार था शून्य ,शून्य यानी कुछ नहीं।
7 वी सदी के मशहूर भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने शून्य के साथ जो गणना का तरीका दिया वो था।
1+0=0
1-0=0
1×0=0
लेकिन वे 1÷0  को देने पर क्या आएगा इसे नहीं बता पाए।इसका उत्तर दिया 12वी सदी के गणितज्ञ भास्कर ने बताया कि शून्य को किसी से भाग देने पर अनन्त प्राप्त होगा।
हालाकि आज की गणित में किसी संख्या को ज़ीरो को भाग देने पर प्राप्त मां को।अनन्त न मानकर अपरिभाषित माना जाता है।
दरसअल भारत वो देश था जिसके दार्शनिकों ने समझा कि अंक सिर्फ गिनने जोड़ने या घटाने के लिए नहीं बल्कि ये तो अदृश्य अमूर्त इकाइयां है । जिनका अपना सवतांटरा रूप है।यही वजह थी कि भारत ने दुनिया को नगेटिव नंबर्स का आइडिया दिया।

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